उसने ग्लासों की ओर इशारा किया.
„एक गिलास शैम्पेन? यह नववर्ष है. आदमी को तारीख पीनी चाहिए, नहीं तो वह उसके गले में अटक जाती है.“
Hans Castorp ने एक गिलास लिया. उसने अपनी उंगलियों में ठंडक महसूस की, और वह आइसबार के बारे में सोचने लगा, बर्फ में लिखे उन शब्दों के बारे में, जो पिघल गए थे; अब बर्फ अदृश्य थी, लेकिन ठंडक अब भी मौजूद थी.
„और स्टोलन“, Kautsonik ने कहा, और उसने एक टुकड़ा आगे किया, सफेद पाउडर से ढका हुआ, मानो वह पहाड़ की बर्फ अपने भीतर लिए हो.
Hans Castorp ने उसे तुरंत नहीं लिया. उसने पाउडर शुगर पर नजर डाली.
„यह बर्फ जैसा दिखता है“, उसने कहा.
„यह बर्फ ही है“, Kautsonik ने शांतिपूर्वक कहा. „सिर्फ मार्ज़िपान के साथ.“
Hans Castorp मुस्कुराया – और इस बार वह नहीं जानता था, कि यह व्यंग्यपूर्ण था या कृतज्ञ.
„आप यह लंबे समय से कर रहे हैं?“ उसने पूछा.
Kautsonik ने उसे देखा, और उस नज़र में एक पूरा घर समाया हुआ था.
„मैंने देखा है“, उसने कहा, „कैसे यहाँ ऊपर लोग आए हैं. और गए हैं. और फिर लौटे हैं. और नहीं गए. और गए, बिना गए हुए.“
Hans Castorp ने आखिरी वाक्य पर एक चुभन महसूस की. वह नहीं जानता था, कि Kautsonik का इशारा उसकी ओर था या सिर्फ सामान्य सच्चाई की ओर; लेकिन Mann के यहाँ, आदरणीय पाठिका, आदरणीय पाठक, सामान्य सच्चाई शायद ही कभी पूरी तरह सामान्य होती है.
„कितने समय से?“ Hans ने पूछा.
Kautsonik ने कंधे उचका दिए.
„दशकों से“, उसने कहा. „पहले यह यहाँ आसान था. तब इसे Empfang कहा जाता था. आज इसे Experience कहते हैं. पहले मेहमान, मेहमान होता था. आज वह एक…“ वह शब्द खोज रहा था और उसे नहीं मिला. „…Case.“
Hans Castorp ने यह शब्द सुना और अनायास ही फाइलों, निदानों, AuDHS के बारे में सोचा.
„और आप?“ उसने पूछा.
Kautsonik मुस्कुराया, और उस मुस्कान में कुछ गर्व था.
„मैं रुका रहा हूँ“, उसने कहा. „यही मेरी प्रतिभा है.“
Hans Castorp ठिठक गया. प्रतिभा शब्द उनके बीच एक दर्पण की तरह खड़ा था.
„आप रुकते हैं“, Hans ने धीरे से कहा.
„हाँ“, Kautsonik ने कहा. „और जानते हैं, रुकने की सबसे अच्छी बात क्या है?“
Hans Castorp ने सिर हिलाया.
„आदमी को खुद को नया नहीं गढ़ना पड़ता“, Kautsonik ने कहा. „उसे बस खड़ा रहना होता है.“
उसने खड़ा रहना शब्द को ऐसे जोर देकर कहा, मानो यह एक सद्गुण हो.
„आप बहुत खड़े रहते हैं“, Hans ने टिप्पणी की.
Kautsonik ने अपनी ही टांगों की ओर देखा, मानो उसे यह पक्का कर लेना हो कि वे अब भी मौजूद हैं.
„मैं खड़ा रहता हूँ“, उसने कहा. „यही मेरा अस्तित्व रूप है. बैठना हर कोई कर सकता है. लेटना वे कर सकते हैं, जो इसे वहन कर सकते हैं. खड़ा रहना सेवा है.“
Hans Castorp ने शैम्पेन का एक घूंट पिया. बुलबुले ऊपर उठे, लेकिन आज उनमें रात वाली सुरुचिपूर्ण अधीरता नहीं थी; वे अधिक संयमित थे, लगभग कर्तव्यनिष्ठ.
„और जब आप और खड़े नहीं रह पाएँगे?“ Hans Castorp ने पूछा, और उसने सुना, कि इस तरह पूछना कितना अप्रसन्नकारी था.
Kautsonik हल्का-सा हँसा. यह कोई मजेदार हँसी नहीं थी, बल्कि एक मजबूत हँसी थी, जो बात को ठीक करना चाहती है.
„तब मैं मर जाऊँगा“, उसने कहा.