अनुभाग 9

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दोपहर बाद वे Tonio से फिर मिले.

या, ठीक कहें तो: उस आकृति से, जिसका नाम Tonio हो सकता था.

उसने आज कोई उत्सव‑पोशाक नहीं पहनी थी; उसने एक सादा पैंट, एक कमीज़ पहनी थी, और छाती पर होटल‑लोगो वाला एक छोटा सा टैग लटक रहा था. नौकरी पर, उसने कहा था. यह भी एक कला है.

वह एक पुल पर उनकी ओर आती हुई आई, रुक गई, क्योंकि उसने Hans को पहचान लिया, और मुस्कुराई.

सेवा के तौर पर नहीं.

ज्यादा यूँ, जैसे कोई तब मुस्कुराता है, जब वह किसी को फिर पहचानता है, जिसने उसके भीतर कुछ जगा दिया हो.

„आप लोग अब भी रास्ते में हैं“, उस व्यक्ति ने कहा.

Hans Castorp ने सिर हिलाया.

„और आप अब भी… नौकरी पर हैं“, उसने कहा.

व्यक्ति हल्के से हँसा.

„इंसान नौकरी पर भी हो सकता है और रास्ते में भी“, उसने कहा. „यह सबसे आधुनिक रूप है.“

Gustav von A. बगल में खड़ा था.

उसने कुछ नहीं कहा.

Tonio – आइए हम उस आकृति को, आदरणीय पाठिका, आदरणीय पाठक, सरलता के लिए यूँ ही कहें, क्योंकि उसने खुद को इस स्थिति में रखा है – ने Gustav की ओर देखा.

नज़र Gustav के बालों पर फिसल गई.

चेहरे पर से.

उस खुशबू पर से, जिसे, अगर कोई काफ़ी क़रीब हो, सूँघे बिना नहीं रह सकता.

Tonio मुस्कुराया नहीं.

Tonio ने बस इतना कहा:

„आप बदल गए हैं…“

Gustav ने ठुड्डी उठाई.

„इंसान को सुथरा होना चाहिए“, उसने कहा.

Tonio ने धीरे से सिर हिलाया.

„इंसान को बहुत कुछ होना चाहिए“, Tonio ने कहा. „ऐसा सुझाया जाता है.“

Hans Castorp ने महसूस किया, जैसे उसके गले में एक हल्की हँसी उठी.

वह एक कड़वी हँसी थी.

क्योंकि यह „ऐसा सुझाया जाता है“ अचानक हर जगह था. यह एक रिफ़्रेन जैसा था, जो दुनिया को एक कुर में बदल देता है.

„क्या सुझाया जाता है?“ Hans Castorp ने पूछा.

Tonio ने उसकी ओर देखा.

और उस नज़र में कुछ ऐसा था, जो मज़ाक नहीं था.

„कि इंसान बीमार न पड़े“, Tonio ने कहा.

Gustav ने हाथ हिलाकर बात टाल दी.

„इंसान बीमार नहीं पड़ता, अगर वह…“, उसने शुरू किया.

Hans Castorp नहीं जानता था, वह क्या कहना चाहता था: अगर वह ठीक‑ठाक हो? अगर वह नहाता हो? अगर उसके पास अनुशासन हो? अगर वह bestforming करता हो?

Tonio ने उसे बीच में ही रोक दिया.

बिना बदतमीज़ी के.

बस साफ़‑साफ़.

„घर में ऐसे लोग हैं, जिन्हें दस्त है“, Tonio ने कहा. „ऐसे लोग हैं, जिन्हें बुखार है. रसोई ज़्यादा कीटाणुरहित करती है. रेलिंग ज़्यादा बार पोंछी जाती हैं. ज़्यादा मुस्कुराया जाता है. और जब ज़्यादा मुस्कुराया जाता है, तो वह कभी अच्छा संकेत नहीं होता.“

Hans Castorp ने Tonio की ओर देखा.

Gustav ने नज़र फेर ली.

„यह वेनिस है“, Gustav ने कहा. „यहाँ हमेशा कुछ न कुछ रहता है.“

Tonio ने सिर हिलाया.

„हाँ“, Tonio ने कहा. „यहाँ हमेशा कुछ न कुछ रहता है. लेकिन कभी‑कभी यह ज़्यादा होता है.“

Hans Castorp ने पानी के बारे में सोचा.

उसने वॉशबेसिन में भूरे, लालिमा लिए निशान के बारे में सोचा.

उसने हिबिस्कस‑लाल के बारे में सोचा.

उसने सोचा: लाल कभी सिर्फ़ सुंदर नहीं होता.

„आप यह मुझे क्यों बता रहे हैं?“ Hans Castorp ने पूछा.

Tonio ने कंधे उचका दिए.

„क्योंकि आप ऐसे देख रहे हैं, जैसे आप यह जानना चाहते हों“, Tonio ने कहा. „और क्योंकि मैं…“

Tonio झिझका.

फिर Tonio ने, धीमे से कहा:

„क्योंकि मैं नहीं चाहता कि लोग बहुत देर तक रुकें.“

Hans Castorp ने एक चुभन महसूस की.

उसने अपनी बीती शाम के आख़िरी वाक्य के बारे में सोचा.

कि इंसान बहुत देर तक रुक जाता है.

उसने Gustav की ओर देखा.

Gustav ने वापस नहीं देखा.

Gustav ने, Tonio के कंधे के ऊपर से, लैगून की ओर देखा.

और Hans Castorp जानता था: Gustav रुकेगा.

इसलिए नहीं कि वह समझता नहीं.

क्योंकि वह समझता है और फिर भी रुकता है.

ऐसा ही होता है इंसान, आदरणीय पाठिका, आदरणीय पाठक: वह जानता है, और वह फिर भी ऐसा करता है.

Tonio चला गया.

नाराज़ नहीं.

बस चेहरे पर उस छोटे से साए के साथ, जिसे कर्मचारी नहीं दिखाने चाहिए, जो लेकिन कभी‑कभी फिसल कर बाहर आ जाता है, क्योंकि कर्मचारी भी इंसान हैं, और इंसान, जैसा कहा गया, जब बात गंभीर हो जाती है, तो मुखौटा पहनने में बुरे होते हैं.

Hans Castorp Gustav के साथ पुल पर खड़ा रह गया.

उनके नीचे का पानी हरा था.

उसमें मीठी‑सी गंध थी.

वह गरम था.

„हमें शायद…“, Hans Castorp ने शुरू किया.

Gustav ने उसे बीच में ही रोक दिया.

„नहीं“, उसने कहा.

बस यह एक शब्द.

नहीं.

यह कोई ज़िद्दी नहीं नहीं था.

यह एक नहीं था, जैसे कोई विराम‑चिह्न.

Hans Castorp चुप रहा.

उसने Morgenstern के बारे में सोचा.

उसने गधे के मुखौटे के बारे में सोचा.

उसने सोचा: Morgenstern मुखौटा उतारना चाहता है, क्योंकि वह अब नीला होने का दावा नहीं करना चाहता.

और Gustav एक मुखौटा लगाता है, क्योंकि वह धूसर रंग बर्दाश्त नहीं कर पाता.

यह, आदरणीय पाठिका, आदरणीय पाठक, जीवन की कड़वी कॉमेडियों में से एक है कि हम अपनी नैतिकता को अक्सर ठीक वहीं सख़्ती से लागू करते हैं, जहाँ वह हमें नहीं चुभती – और हम उसे वहीं नरम कर देते हैं, जहाँ वह हमें बचा सकती थी.

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