अनुभाग 10

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शाम को Gustav चुप था.

वह भावुक अर्थ में उदास नहीं था. वह वैसे चुप था wie कोई, जो काम करता है.

होटल के कमरे में – उस बड़े, अंधेरे, schweren कमरे में, जो एक वेदी जैसा है – वह मेज़ पर बैठा था.

नोटबुक उसके सामने पड़ी थी.

वह खुली थी.

यह कम ही होता था.

Hans Castorp किनारे पर एक कुर्सी पर बैठा था, क्योंकि उसने inzwischen यह आदत डाल ली थी कि हमेशा तुरंत अपने ही अनुष्ठानों में नहीं भागे, बल्कि कभी‑कभी दूसरे के पास रहे, भले ही यह असुविधाजनक हो.

Gustav लिख रहा था.

ज़्यादा नहीं.

एक वाक्य.

फिर एक और.

फिर उसने कुछ काट दिया.

फिर वह फिर से लिखने लगा.

Hans Castorp ने अपने ही हाथों की ओर देखा.

उसने अंगूठी देखी.

उसने देखा कि आज प्रगति‑वृत्त लगभग पूरा भरा हुआ था.

उसने बहुत क़दम चल लिए थे.

उसने थोड़ा पानी पिया था, jedenfalls kein Leitungswasser.

उसने कोई कच्चे समुद्री जीव नहीं खाए थे.

उसने सब कुछ किया था, जो empfohlen wird.

और फिर भी वह खुद को सुरक्षित नहीं महसूस कर रहा था.

सुरक्षा, उसने सोचा, शायद सबसे बड़ा मुखौटा है: इसे इसलिए पहना जाता है, क्योंकि आदमी मानता है कि यह मौजूद है, और ठीक इसी वजह से यह ख़तरनाक हो जाती है.

„आप क्या लिख रहे हैं?“ Hans Castorp ने आख़िर पूछा.

Gustav ने नज़र उठाई.

„कुछ नहीं“, उसने कहा.

Hans Castorp मुस्कुराया.

„यह तो कुछ जैसा दिखता है“, उसने कहा.

Gustav ने फिर कागज़ पर नज़र डाली.

„मैं लिख रहा हूँ“, उसने धीरे से कहा, „ताकि मैं…“

वह रुक गया.

Hans Castorp इंतज़ार करता रहा.

इंतज़ार करना, आदरणीय पाठिका, आदरणीय पाठक, एक ऐसा गुण है, जिसे आदमी उसे अनुकूलित करके नहीं सीखता; वह इसे सहकर सीखता है.

Gustav ने कहा:

„…ताकि मैं न जाऊँ.“

Hans Castorp ने समझ लिया.

रुकने के रूप में लिखना.

मुखौटे के रूप में लिखना.

वैधता के रूप में लिखना.

Tonio ने कहा था: आदमी को सृजनशील होना चाहिए, ताकि वह विचार में आए.

Gustav सृजनशील था.

और ठीक इसी वजह से, Hans Castorp ने सोचा, वह रुकता है.

क्योंकि वह मानता है कि यह जगह, यह सुंदरता, यह ख़तरा उसे कुछ देती है, जिसकी उसे अपने वाक्यों में ज़रूरत है.

Hans Castorp ने Gustav की ओर देखा.

बाल गहरे थे.

चेहरा मटमैला.

यह, अगर सख़्ती से कहें, तो सफल था.

लेकिन माथे पर, बालों की जड़ों पर, हल्की‑सी पसीने की परत चमक रही थी.

हवा गर्म थी.

बाहर की रात नम थी.

Hans Castorp ने देखा, कैसे Gustav, बिल्कुल अनजाने में, उंगली बालों की जड़ों पर ले गया, जैसे वह जाँचना चाहता हो कि सब कुछ टिक रहा है या नहीं.

उंगली वापस आई.

वह हल्की‑सी गहरी थी.

ज़्यादा नहीं.

बस एक आभास.

लेकिन Hans Castorp ने उसे देखा.

और यह आभास, आदरणीय पाठिका, आदरणीय पाठक, एक छोटे‑से इक़रार जैसा था: मुखौटा टिकता नहीं. वह कभी नहीं टिकता.

Gustav को महसूस हुआ कि Hans ने यह देख लिया था.

उसने हाथ वापस खींच लिया.

वह बहुत हल्का‑सा मुस्कुराया.

„गर्मी है“, उसने कहा.

Hans Castorp ने सिर हिलाया.

„हाँ“, उसने कहा. „गर्मी है.“

बाहर पानी कलकल कर रहा था.

कमरे में इत्र की गंध थी.

और इस मिश्रण में – पानी और सुगंध, समय और मुखौटा – कुछ ऐसा था, जिसे Hans Castorp नाम नहीं दे सका, लेकिन महसूस किया: अंत के क़रीब होने की एक निकटता.

उसने अपना नोटबुक उठाया.

कार्यक्रम के तहत नहीं.

आवेग से.

उसने उसे खोला.

उसने एक वाक्य लिखा.

उसने लिखा:

bestforming एक मुखौटा है.

फिर वह ठिठक गया.

उसने वाक्य काट दिया.

उसने नीचे लिखा:

मुखौटा bestforming है.

फिर उसने इसे भी काट दिया.

आख़िरकार उसने छोटा‑सा लिखा, जैसे यह ऊँची आवाज़ में नहीं होना चाहिए:

डर सबसे पुरानी सौंदर्य‑साधन है.

उसने क़लम रख दी.

उसने Gustav की ओर देखा.

Gustav लिखता रहा.

या ऐसा दिखा रहा था.

Hans Castorp ने उंगली पर वह छोटा‑सा गहरा आभास देखा.

उसने चिकना, मटमैला माथा देखा.

उसने गहरे बाल देखे.

और उसने बहुत धीरे, बहुत साफ़‑साफ़ सोचा, जैसे कोई, जो System 2 benutzt, obwohl es Mühe macht:

जवान दिखने की कोशिश बूढ़ा बना देती है.

इसलिए नहीं कि वह नाकाम होती है.

बल्कि इसलिए कि वह दिखाती है, जिससे आदमी डरता है.

उसने खिड़की की ओर देखा.

बाहर लैगून थी.

वह प्रतिबिंबित कर रही थी.

वह कुछ भी सुनिश्चित नहीं करती थी.

वह थामे हुए थी.

और वह इंतज़ार कर रही थी, धैर्य से, हरी, मीठी‑सी, जैसे उसने दुनिया के सारे मुखौटे पहले ही देख लिए हों और जानती हो कि अंत में हमेशा सिर्फ़ पानी ही बचता है.

Hans Castorp ने आँखें बंद कर लीं.

उसे इत्र की गंध आई.

उसे कलकल की आवाज़ सुनाई दी.

उसे अपनी उंगली पर अंगूठी महसूस हुई, यह छोटी‑सी आँख.

और उसने महसूस किया, बहुत हल्के से, बहुत मीठे‑से, बहुत अप्रसन्नतापूर्वक:

कि आदमी बहुत देर तक रुक जाता है.

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