अनुभाग 4

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काउंटर के पीछे दुनिया अलग थी.

हॉल अब भी सुनाई दे रहा था, दबा‑दबा सा: आवाज़ें, रोलकफ़र, गिलासों की खनखनाहट, उस तकनीक की भनभनाहट, जो कहती है: सब कुछ नियंत्रण में है. लेकिन यहाँ, दरवाज़े के पीछे, कागज़ और प्रिंटर की गर्मी की गंध थी, कॉफ़ी की, सफ़ाई के सामान की; यहाँ काम की गंध थी, अनुभव की नहीं.

एक सँकरा गलियारा एक ऐसे कमरे तक जाता था, जो कमरा होना ही नहीं चाहता था, बल्कि एक फ़ंक्शन: बैकऑफ़िस.

वहाँ मेज़ें रखी थीं. मॉनिटर. फ़ाइलें. एक रैक जिसमें की‑कार्डें थीं, क़तारों में सलीके से, जैसे वे दाँत हों. दीवार पर एक प्लान टंगा था: आगमन, प्रस्थान, VIP, शिकायतें, इच्छाएँ. शब्द इतने तटस्थ थे कि वे ठीक इसी वजह से कुछ ठंडे लगते थे.

Kautsonik अंदर आया, जैसे वह किसी चर्च में प्रवेश कर रहा हो.

वह न तेज़ चला, न धीमा; वह वैसे ही चला, जैसे वह हमेशा चलता था. और Hans Castorp ने महसूस किया कि यह आदमी इस कमरे में हर किसी Wohnung से ज़्यादा घर पर था.

„यह“, Kautsonik ने कहा और मॉनिटरों पर एक छोटी‑सी हरकत की, „दिल है.“

Hans Castorp ने स्क्रीन की ओर देखा. एक पर एक सूची थी: नाम, कमरा नंबर, आगमन समय, प्रस्थान समय. दूसरे पर: प्रोफ़ाइलें. तीसरे पर: एक सिस्टम, जो कैलेंडर जैसा दिखता था, लेकिन समय नहीं, बल्कि लोगों को प्रबंधित करता था.

„गेस्ट रिलेशंस“, Hans Castorp ने कहा, ज़्यादा अपने आप से, Kautsonik से कम.

Kautsonik ने सिर हिलाया.

„हाँ“, उसने कहा. „इसे ऐसे ही कहते हैं. पहले कहा जाता था: रिसेप्शन. वह ज़्यादा ईमानदार था. रिसेप्शन का मतलब है: तुम आते हो, मैं तुम्हें ग्रहण करता हूँ. रिलेशंस का मतलब है: तुम एक रिश्ता हो.“

उसने „रिश्ता“ ऐसे ज़ोर देकर कहा, जिससे पता चलता था कि वह इस शब्द पर यक़ीन नहीं करता था.

Hans Castorp और क़रीब आया. उसकी नज़र एक फ़ाइल पर पड़ी, जो मेज़ पर खुली पड़ी थी. कवर पर बड़े अक्षरों में लिखा था: इतिहास.

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