अनुभाग 4

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वह आगे गया, गैलरी के पीछे वाले हिस्से में, जहाँ एक मेज़ रखी थी.

और वहाँ Gustav von A. बैठा था.

उसे man daran nicht erkannte, dass er „berühmt“ aussähe – Berühmtheit, verehrte Leserin, verehrter Leser, ist selten ein Gesicht, öfter eine Haltung –, sondern daran, dass er nicht las, wie Menschen in Hotels lesen, nämlich um sich zu entspannen oder zu schmücken, sondern so, als sei das Lesen Arbeit. उसके बगल में एक नोटबुक रखी थी. वह उसमें लिख रहा था, बिना हड़बड़ी के, लेकिन बिना उस सुस्ती के, जो छुट्टी मनाने वाले लोग दिन पर लगा देते हैं, जैसे वे खुद को साबित करना चाहते हों कि वे आज „कुछ नहीं müssen“.

Hans Castorp रुक गया.

ऐसा था, जैसे वह वैधता का कोई रूप देख रहा हो, जो उसे नहीं मिला था.

Gustav ने नज़र उठाई.

उसने Hans Castorp को देखा, न जिज्ञासु, न परखते हुए, बल्कि उस अनआकर्षक चौकन्नेपन के साथ, जो कुछ लोगों में होता है, जो आसानी से धोखा नहीं खाते, क्योंकि वे खुद को बहुत बार धोखा दे चुके होते हैं.

„आप फिर ऊपर हैं“, Gustav ने कहा.

Hans Castorp ने सिर हिलाया.

„मैं हूँ…“ उसने शुरू किया – और उसे महसूस हुआ, कि किसी होटल में Sein के बारे में कुछ कहना कितना हास्यास्पद है.

Gustav हल्का-सा मुस्कुराया.

„आप बहुत…“ उसने कहा, और वह उस शब्द को खोजता हुआ लगा, जिसे Zieser और Porsche और AuDHS समान रूप से gern benutzen würden. „…optimiert.“

Hans Castorp को मुस्कुराना पड़ा. इस शब्द में कुछ मज़ेदार था, क्योंकि यह इतना तकनीकी है और फिर भी इतना मानवीय अर्थ रखना चाहता है.

„यह एक प्रोग्राम है“, उसने कहा.

„हाँ“, Gustav ने कहा. „प्रोग्राम हमेशा सही होते हैं. वे ऐसे ही बनाए जाते हैं.“

Hans Castorp बैठ गया, सीधे सामने नहीं, बल्कि थोड़ा तिरछा – वह बर्गरliche दूरी, जिसे वह बार‑बार बनाए रखता था, भले ही वह निकटता की लालसा रखता हो.

उसने नोटबुक की ओर देखा.

„आप लिख रहे हैं“, उसने कहा.

„मुझे लिखना पड़ता है“, Gustav ने कहा. „वरना मैं नहीं ठहरूँगा.“

Hans Castorp को Zieser याद आया: Wer schreibt, der bleibt. जिम का एक जुमला, जो यहाँ ऊपर अचानक साहित्य बन गया.

„और क्या“, Hans Castorp ने सावधानी से पूछा, „आप क्या लिखते हैं?“

Gustav ने कंधे उचका दिए.

„सफेद धब्बे“, उसने कहा.

Hans Castorp ने सीने में एक हल्का-सा झटका महसूस किया, जैसे किसी ने थोड़ी देर के लिए उसकी अंगूठी कस कर खींच दी हो.

„आपका क्या मतलब है?“ उसने पूछा.

Gustav ने कलम से नोटबुक की एक जगह पर इशारा किया, जो सचमुच खाली थी: एक अनुच्छेद, एक खाली जगह.

„यह“, उसने कहा. „अलिखित. अनकहा. वह, जिसे man nicht füllt, weil man weiß, dass jede Füllung eine Lüge wäre.“

Hans Castorp ने उस खालीपन को देखा, और उसने महसूस किया, कि वह कितना असुविधाजनक है – और कितना आवश्यक.

„हमारा समय“, Gustav ने आगे कहा, „पूर्णता के साथ एक जुनून रखता है. वह सब कुछ मापना चाहता है, सब कुछ बताना, सब कुछ दिखाना. और जब कुछ कमी रह जाती है, तो उसे सीमा के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता, बल्कि गलती के रूप में. आप इसे जानते हैं.“

Hans Castorp ने अनायास हाथ उठाया, अंगूठी की ओर देखा.

Gustav ने यह देखा.

„आह“, उसने धीरे से कहा. „आँख.“

Hans Castorp कुछ व्यंग्यात्मक‑विद्वत्तापूर्ण कहना चाहता था, कुछ Settembrinihaftes शायद, लेकिन वह Settembrini नहीं था. वह Hans Castorp था, और Hans Castorp ने इसके बजाय कहा:

„यह सुकून देता है.“

Gustav ने सिर हिलाया.

„सुकून एक बड़ी ताकत है“, उसने कहा. „यह एक बड़ा झूठ भी हो सकता है.“

वह थोड़ा आगे झुका.

„अपने आप को ज़्यादा मत सुधारिए“, उसने फिर कहा, और यह वाक्य इतना सादा, इतना बिना भावुकता के गिरा, कि वह ठीक इसी वजह से एक हुक्म जैसा लगा.

Hans Castorp मुस्कुराया, क्योंकि वह इस वाक्य को जानता था – और क्योंकि वह उसे अब भी नहीं समझता था.

„आदमी खुद को कैसे सुधार सकता है“, उसने पूछा, „बिना…?“

Gustav ने हाथ उठाया.

„मैं यह नहीं कहता: खुद को मत सुधारिए“, उसने कहा. „मैं कहता हूँ: एक छेद छोड़िए. एक किनारा छोड़िए. कुछ ऐसा छोड़िए, जो नियंत्रित न हो. नहीं तो आप कभी इंसान नहीं रहेंगे, बल्कि…“ उसने थोड़ी देर खोजा. „…एक परफेक्ट फ़ाइल.“

Hans Castorp ने अपने उपनाम के बारे में सोचा. कागज़ात के बारे में. उन दरवाज़ों के बारे में, जो बंद हो गए थे, इससे पहले कि कोई समझ पाता, कि उनके आर-पार कौन था. उसने सोचा: मैं बच गया, क्योंकि मैं एक खाली जगह था.

„आपका मतलब है“, उसने धीरे से कहा, „कि यह खाली जगह…“

„…आपकी रक्षा करती है“, Gustav ने कहा. „और आपको मजबूर भी करती है. दोनों.“

वह पीछे की ओर झुक गया.

„एक वाक्य“, उसने कहा, „सफेद से जीता है. वह सिर्फ अक्षर नहीं है. वह दूरी भी है. विराम. साँस.“

Hans Castorp ने उसकी ओर देखा.

„और एक जीवन?“ उसने पूछा.

Gustav फिर मुस्कुराया, हल्का-सा, और यह एक ऐसी मुस्कान थी, जो न दिलासा देती थी, न चोट पहुँचाती थी.

„एक जीवन भी“, उसने कहा.

फिर वह चुप हो गया, और यह चुप्पी कोई कमी नहीं, बल्कि एक जगह थी.

Hans Castorp ने महसूस किया, कि वह कुछ करना चाहता है – न सोचना, न महसूस करना, बल्कि करना.

वह उठ खड़ा हुआ.

„धन्यवाद“, उसने कहा.

Gustav ने सिर हिलाया, जैसे यहाँ शुक्रिया ज़रूरी न हो, क्योंकि यहाँ बात दोस्ती की नहीं, बल्कि सच्चाई की थी.

Hans Castorp सीढ़ियाँ उतर गया, झूमर के नीचे से, और झूमर उसके ऊपर जल रहा था, एक व्यवस्थित सूरज की तरह.

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