आरामकक्ष, आदरणीय पाठिका, आदरणीय पाठक, बैठक‑कक्ष और लाज़रेट की एक अजीब मिश्रण था. वह गरम था, लकड़ी से पैनल किया हुआ, बड़े खिड़कियों के साथ, जिनके पीछे बर्फ एक मौन धमकी की तरह पड़ी थी. कमरे में खाटें रखी थीं – साधारण खाटें नहीं, बल्कि पहियों वाली खाटें, मानो कोई यह तय नहीं कर पाया हो कि मेहमान को आज़ादी देनी है या रोगी‑होने की स्थिति. उन पर कंबल पड़े थे, भूरे, भारी, मुलायम. और बीच में लकड़ी का एक बड़ा, डिब्बानुमा शरीर खड़ा था, जो एक चूल्हे जैसा लगता था, एक आरामदेह मशीन जैसा, जिसमें गर्मी को पदार्थ की तरह जमा किया जाता है.
Hans Castorp एक खाट पर लेट गया.
उसने यह बिना शर्म के किया. बाथरोब में शर्म वैसे भी एक कमजोर संस्था है.
Morgenstern बगल की एक खाट पर लेट गया. उनके बीच एक दूरी थी, जो बुर्जुआ थी, पर ठंडी नहीं.
कुछ देर तक वे बस यूँ ही पड़े रहे. हीटर की हल्की गुनगुनाहट सुनाई देती थी. कहीं से एक सरसराहट सुनाई देती थी – शायद कोई, जो अपना कंबल ठीक कर रहा था, शायद कोई शरीर, जो नींद में अपना बचाव कर रहा था.
फिर Morgenstern ने कहा, बहुत धीरे, जैसे उसे कमरे को stören करने का डर हो:
„मैंने कल अपनी पत्नी से कहा, वह बढ़ा‑चढ़ाकर कहती है. और वह रोई. और मैंने कहा, वह संवेदनशील है. और मैं हँसा, जैसे यह कोई मज़ाक हो.“
वह चुप हो गया.
„और अब मैं सोचता हूँ“, वह आगे बोला, „कि वह हँसी… असली समस्या थी. वाक्य नहीं. बल्कि यह…“ वह शब्द खोज रहा था. „…यह उसके‑ऊपर‑खड़ा‑होना.“
Hans Castorp ने कथावाचक के बारे में सोचा, औक्तोरियल स्थिति के बारे में; और उसने सोचा, कितना अरुचिकर है यह, कि आदमी हर जगह „ऊपर“ खड़ा हो सकता है: दृश्य के ऊपर, साथी के ऊपर, अपनी ही गलती के ऊपर. और यह कि यह „ऊपर“ हिंसा का एक रूप है, जब आदमी इसे महसूस नहीं करता.
„उसके‑ऊपर‑खड़ा‑होना“, उसने कहा, „एक सुंदर स्थिति है. आदमी सब कुछ देखता है. बस दूसरे को नहीं.“
Morgenstern ने सिर हिलाया, जैसे उसने ठीक यही कहना चाहा हो.
„सम्मान“, उसने एक बार फिर कहा, और अब यह किसी शीर्षक जैसा कम, किसी प्रार्थना जैसा ज़्यादा लगा. „सहानुभूति. ज़िम्मेदारी. सुरक्षा. साझेदारी.“
उसने ये पाँच शब्द ऐसे कहे, जैसे पाँच सीढ़ियाँ, जिन्हें आदमी चढ़ना ही पड़ता है, हालाँकि वह जानता है कि वह ठोकर खा सकता है.
Hans Castorp ने खिड़की के पार बर्फ की ओर देखा.
बर्फ सफेद थी. वह सब कुछ ढँक देती थी. वह दुनिया को साफ कर देती थी, जैसे कोई ताज़ा कपड़ा. और फिर भी आदमी जानता था कि उसके नीचे सब कुछ अब भी है: रास्ते, पत्थर, घास. वह बस छिपा हुआ था.
उसने सोचा: शायद वह, जिसे Morgenstern „नीली घास“ कहता है, कुछ और नहीं, बल्कि बर्फ के नीचे किसी चीज़ को रंगने की कोशिश है, ताकि आदमी महसूस न करना पड़े कि वह अब भी वहाँ है.
उसने बिना सोचे, अपने बाथरोब की जेब में हाथ डाला.
लकड़ी की तीलियाँ अब भी वहाँ थीं.
उसने उसे निकाला और देखा. फिर उसने, बहुत धीरे, नोक ली और उससे लिखा, कागज़ पर नहीं – वहाँ कोई कागज़ नहीं था –, बल्कि खिड़की के धुँधले काँच पर: एक रेखा, फिर एक और, फिर एक अक्षर, जो ठीक से अक्षर नहीं बन पाया.
वह तुरंत धुँधला गया.
संघनित पानी ने उस निशान को अपने में ले लिया और उसे अपने भीतर खींच लिया, मानो उसे पहचानों के लिए कोई धैर्य न हो.
Morgenstern ने यह देखा.
„आप लिख रहे हैं“, उसने कहा.
Hans Castorp मुस्कुराया.
„मैं कोशिश कर रहा हूँ“, उसने कहा.
Morgenstern कुछ क्षण चुप रहा. फिर उसने कहा:
„आदमी को इसके लिए तैयार रहना चाहिए कि यह धुँधला हो जाएगा.“
Hans Castorp ने उसकी ओर देखा.
„हाँ“, उसने कहा. „यही ख़तरा है. और यही आज़ादी.“
बाहर, कहीं, किसी डाल से थोड़ा‑सा बर्फ गिरा. अंदर भाप अब भी बालों में पड़ी थी. और Hans Castorp, जो नाम और उपनाम के बीच जीता था, अपराधबोध और आत्म‑सुरक्षा के बीच, मुखौटे और भूख के बीच, ने सोचा – किसी अवधारणा की तरह नहीं, बल्कि एक अनुभूति की तरह –, कि शायद दो तरहें हैं, अब और गधा न रहने की:
एक यह है, कि आदमी सच कहे.
दूसरी यह है, कि आदमी नीले पर ज़ोर देना बंद कर दे, जब वह हरे को बर्दाश्त नहीं कर पाता.
उसने आँखें बंद कर लीं.
और बहुत समय बाद पहली बार – शायद पहली वालपुरगिसनाख्त के बाद से – वह थोड़ा‑सा सो गया, न गहरी नींद, न लंबी, पर ईमानदार.